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हमारा परिचय

श्री शिव प्रसाद संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना 1942 में वसन्त पंचमी के दिन लखनऊ विश्वविद्यालय के तत्कालीन संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो0 के0 ए0 अय्यर की अध्यक्षता व राय साहब कुंज बिहारी चक्रवर्ती जी के मार्ग निर्देशन में की गयी थी। तत् समय लखनऊ जनपद की अनेक प्रतिष्ठित विभूतियों ने विद्यालय के प्रबन्धन में समय-समय पर अपना सहयोग प्रदान किया।

सबके सहयोग और अथक प्रयास से विद्यालय ने थोड़े ही समय में अभूतपूर्व ख्याति प्राप्त कर ली और भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों की प्रथम पसन्द बन गया।

हमें यह विद्यालय एक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में प्राप्त हुआ है और हम एक पहरी की भाँति इस धरोहर की रक्षा करने का प्रयास कर रहे हैं।

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हम सहयोग एवं सहकारिता की भावना से प्रेरित कार्यकर्ताओं का छोटा सा समूह हैं जो अज्ञान तिमिर में भटक रहे नन्हे बालकों की जीवन राह को ज्ञान-प्रकाश से अलोकित करने का निरन्तर प्रयास कर रहा है।

हमारा मानना है इस कार्य को करते हुए हमें भारतीय संस्कृति के संरक्षण में भी योगदान देना है।

यही कारण है कि भारतीय संस्कृति, हमारी शिक्षा पद्यति में परिलक्षित है और निरन्तर विद्यार्थियों के बाल-मन को प्रभावित करती हुए, उन्हे एक सुनिश्चित व्यक्तित्व प्रदान कर रही है।

“हमारा इतिहास”

इस विद्यालय का इतिहास, भारत की आजादी के पूर्व का इतिहास है। उस समय भारतीय संस्कृति, प्रत्येक भारतीय नागरिक की सोच, व्यवहार एवं व्यक्तित्व में रची बसी थी।

जिस व्यक्ति के व्यक्तित्व में वह जितनी अधिक परिलक्षित होती थी, वह उतना ही प्रतिष्ठित, आदरणीय एवं सम्मानीय होता था। ऐसे ही एक प्रतिष्ठित एवं सम्मानित व्यक्ति थे, श्री राय साहब कुंज बिहारी चक्रवर्ती। वह लखनऊ शहर के सम्मानित व्यक्ति थे। वह ज्ञानवान, प्रतिभावान और संवेदनशील व्यक्ति थे।

उन्होंने सन् 1942 में शिव प्रसाद संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना की, उसे तन, मन, धन से परिपोषित करके ज्ञान विज्ञान एवं भारतीय संस्कृति की तपस्थली बनाया।

एक समय था, जब इस विद्यालय में प्रवेश लेना, मानवता के उच्च मूल्यों के प्रति जीवन समर्पित कर देना समझा जाता था। इतिहास गवाह है कि  थोड़े ही समय में, इस विद्यालय ने लखनऊ जनपद के प्रतिष्ठित विद्यालयों में अपनी जगह बना ली थी। यहाँ पढ़ना, विद्यार्थियों के लिए गौरव का विषय हुआ करता था।

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जैसे-जैसे पाश्चात्य सभ्यता, भारतीय संस्कृति पर हावी हुई, इस विद्यालय की कान्ति क्षीण होती गई। एक समय आया जब यह विद्यालय गुमनामी के अंधेरे में खो गया। विद्यालय प्रांगण पुराने खंडहर में बदलने लगा।

वर्ष 2000 तक सारे अध्यापक, प्राधानाचार्य आदि सेवानिवृत्त हो गए। इस शिक्षण संस्थान का कोई भी मार्गदर्शक न रहा। इस अन्तराल को विद्यालय का कृष्ण पक्ष कहना असंगत नहीं होगा।

लेकिन यह सच है कि ऊपर से विद्यालय खंडहर में परिवर्तित हो रहा था, लेकिन अंदर ही अन्दर भारतीय संस्कृति को चिरकाल तक जीवित रखने की, श्री राय साहब की चाह उनके अदृष्य रूप में प्रबल होती जा रही थी। 18 नवम्बर 2021 को उनकी यह चाह इतनी सबल हो गई कि विद्यालय को पुनरजीवित करने के सभी प्रयास, साकार होने लगे।

आज, खंडहर का विद्यालय में परिवर्तित होना, विद्यालय प्रांगण में विद्यार्थियों की चहल पहल लौट आना, कक्षाओं में आचार्यो के प्रशिक्षण की गूँज, एक दिवा स्वप्न लगती है लेकिन यह सच है और आज का यथार्थ भी है।

आज श्री विनोद मिश्रा जी, प्रधानाचार्य के रूप में इस विद्यालय के विकास के लिए, मन, वचन, कर्म से जुटे हुए हैं। वह इस विद्यालय को अपनी कर्म-भूमि मानते हैं, और इसी के प्रति पूरी तरह से समर्पित हैं।

आज इस विद्यालय में, लगभग 200 बच्चे प्रशिक्षण ले रहे हैं, जिनमें से 40 बच्चे आवासीय बच्चे हैं।

विद्यालय के सारे बच्चों के अभिभावक ग्रामीण क्षेत्र के निवासी है। उनकी आर्थिक स्थिति का वर्णन यहाँ करना ठीक नहीं होगा। उसका अनुमान लगा लेना ही उचित होगा। ऐसी स्थिति में विद्यालय का निरन्तर आभावों से ग्रसित रहना स्वाभाविक है। लेकिन चाह से ही राह निकलने का सिद्धान्त भी उतना ही स्वाभाविक है।

उसी सिद्धान्त को आधार मानते हुए, प्राधानाचार्य, शिक्षक एवं सहयोगी, सभी प्रयत्नरत् हैं और अपने कार्यों को पूरी निष्ठा एवं मनोयोग से कर रहे हैं।

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हमारा मिशन

हमारा मिशन है कि समय के साथ क्षीण पड़ गई भारतीय संस्कृति को पुनः प्रखर बनाया जाए। उसी के आलोक में विद्यार्थियों को प्रशिक्षित किया जाए, जिससे कि वह सर्वप्रथम एक अच्छे इंसान बन सकें और अपने ज्ञान, आचरण एवं व्यक्तित्व से औरों को भी अपने जैसा बनने के लिए प्रेरित कर सकें।

हमारी मान्यता

हमारा मानना है कि हर विद्यार्थी के अन्दर कुछ विशेष गुण एवं प्रतिभाएं छिपी होती है, जिन्हें पोषित एवं विकसित करके, उसे प्रखर व्यक्तित्व का धनी बनाया जा सकता है। यह बीजों को पोषण दे कर, उनकी देख भाल करके,उन्हें वृक्ष बनाने जैसा है।

हम, प्रधानाचार्य, अध्यापक एवं सभी सहयोगी-जन जानते हैं कि विद्यार्थियों का विकास हमारी जिम्मेदारी ही नही हमारा उत्तरदायित्व भी है।

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