जैसे-जैसे पाश्चात्य सभ्यता, भारतीय संस्कृति पर हावी हुई, इस विद्यालय की कान्ति क्षीण होती गई। एक समय आया जब यह विद्यालय गुमनामी के अंधेरे में खो गया। विद्यालय प्रांगण पुराने खंडहर में बदलने लगा।
वर्ष 2000 तक सारे अध्यापक, प्राधानाचार्य आदि सेवानिवृत्त हो गए। इस शिक्षण संस्थान का कोई भी मार्गदर्शक न रहा। इस अन्तराल को विद्यालय का कृष्ण पक्ष कहना असंगत नहीं होगा।
लेकिन यह सच है कि ऊपर से विद्यालय खंडहर में परिवर्तित हो रहा था, लेकिन अंदर ही अन्दर भारतीय संस्कृति को चिरकाल तक जीवित रखने की, श्री राय साहब की चाह उनके अदृष्य रूप में प्रबल होती जा रही थी। 18 नवम्बर 2021 को उनकी यह चाह इतनी सबल हो गई कि विद्यालय को पुनरजीवित करने के सभी प्रयास, साकार होने लगे।
आज, खंडहर का विद्यालय में परिवर्तित होना, विद्यालय प्रांगण में विद्यार्थियों की चहल पहल लौट आना, कक्षाओं में आचार्यो के प्रशिक्षण की गूँज, एक दिवा स्वप्न लगती है लेकिन यह सच है और आज का यथार्थ भी है।
आज श्री विनोद मिश्रा जी, प्रधानाचार्य के रूप में इस विद्यालय के विकास के लिए, मन, वचन, कर्म से जुटे हुए हैं। वह इस विद्यालय को अपनी कर्म-भूमि मानते हैं, और इसी के प्रति पूरी तरह से समर्पित हैं।
आज इस विद्यालय में, लगभग 200 बच्चे प्रशिक्षण ले रहे हैं, जिनमें से 40 बच्चे आवासीय बच्चे हैं।
विद्यालय के सारे बच्चों के अभिभावक ग्रामीण क्षेत्र के निवासी है। उनकी आर्थिक स्थिति का वर्णन यहाँ करना ठीक नहीं होगा। उसका अनुमान लगा लेना ही उचित होगा। ऐसी स्थिति में विद्यालय का निरन्तर आभावों से ग्रसित रहना स्वाभाविक है। लेकिन चाह से ही राह निकलने का सिद्धान्त भी उतना ही स्वाभाविक है।
उसी सिद्धान्त को आधार मानते हुए, प्राधानाचार्य, शिक्षक एवं सहयोगी, सभी प्रयत्नरत् हैं और अपने कार्यों को पूरी निष्ठा एवं मनोयोग से कर रहे हैं।