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हमारी अपेक्षाएँ
कभी कभी विचार आता है कि यदि, हमारा दायित्व छात्रों को, केवल अच्छी शिक्षा देना होता, तो यह एक आसान कार्य होता। शायद हमारे अन्दर विद्यार्थियों को अच्छा शिक्षण देने की जो ललक है, उससे हमारा दायित्त्व पूरा हो जाता। लेकिन सच तो यह है कि हम अपना दायित्व, इससे कहीं अधिक बड़ा मानते हैं। हमें विद्यार्थियों को ज्ञानवान, प्रतिभावान, संस्कारवान और उससे ऊपर, एक अच्छा इन्सान बनाना है।
यह कार्य तब अनेकों गुना कठिन हो जाता है, जब हम आभावों से ग्रस्त हों और पढ़ने वाले छात्र और उनके माता पिता (यदि जीवित है तो) भी अति आभावों में हों ।
ऐसी परिस्थितियों में, कार्यकर्ताओं की संकल्प शक्ति, ईश्वर में आस्था और परिजनों का सहयोग, चल रहे प्रयत्नों प्रयासों को वायरल कर देते हैं और उनसे असंभव भी संभव होने लगता है। हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है।
हमारी यह शिक्षण यात्रा रवीन्द्रनाथ ठाकुर की निम्नलिखित पंक्तियों से आरम्भ हुई थी:
जोदि तोरे डाक शुने केऊ न आसे तोबे एकला चलोरे।
और अब की स्थिति मजरूह सुलतानपुरी की नज्म़ जैसी है:
मै अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर लोग आते गए और कारवां बनता गया।
हम अपने आभावों के साथ, अपना हौसला लिए मंजिल की ओर बढ़ रहे हैं। लोग हमसे जुड़ रहे हैं। हमारा सहयोग कर रहे है। हम, जुड़ने वाले सभी व्यक्तियों का हृदय से धन्यवाद करते हैं।
हमें आशा है कि निकट भविष्य में, हमसे और भी प्रतिभावान, सक्षम एवं संवदेनशील लोग जुड़ेंगे और मिशन की सफलता के लिए अपना योगदान देंगे।
हमारी आवश्यकताओं की सूची यहाँ वैब साइट पर उपलब्ध है। हम चाहते हैं कि आप इस सूची को स्वयं देखें और अपनी प्रतिभा, क्षमता और सामर्थ्य के अनुसार इस बात का निर्णय करें कि आप क्या योगदान दे सकते हैं।
हमसे सम्पर्क स्थापित करने के लिए यहाँ दिए गए फ़ॉर्म को भरें और मैसेज भेजें बटन पर क्लिक करें।